The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) and Rajasthan Asangathit Mazdoor Union (RAMU), strongly condemn the various State governments’ callous decisions to dilute or suspend labour laws. We stand in solidarity with the nationwide strike by Trade Unions on May 22, 2020, against the Centre and States’ regressive steps.

The Covid-19 pandemic and the subsequent poorly planned government-imposed lockdown has resulted in a dire situation for labour and working classes, who find themselves unemployed with no social security. In the midst of such a human calamity, instead of ensuring the fundamental rights and protections of workers, the governments of Uttar Pradesh, Madhya Pradesh and Gujarat have adopted draconian measures that exempt businesses and corporate establishments from providing workers with basic amenities for roughly the next 3 years. Additionally, the governments of Rajasthan, Punjab, Haryana, Goa, Himachal Pradesh, Odisha and Uttarakhand have relaxed sections of the Factories Act, 1948, thereby allowing increased working hours from 9 hours to 12 hours per day.

These are regressive, undemocratic and unconstitutional steps. Labour laws have historical precedence in worker mobilisations since pre-independence. The right against exploitation is a fundamental right enshrined in the Indian Constitution (Articles 23 and 24). Instead of providing adequate relief to a section of society languishing during the lockdown – the poor and working class – these State governments have chosen to promote the interests of capitalist classes. The MKSS fears that this abrogation of labour rights will take the States back to feudal, dehumanising and slave-like conditions for the poor worker.

The ordinance passed by Uttar Pradesh and promulgated by Madhya Pradesh and Gujarat propose to exempt factories, businesses and other establishments from the purview of most labour laws regulating work conditions. This effectively denies employees mandatory provision of toilets, drinking water, rest breaks, weekly holidays, sitting facilities, protective equipment, medical aid, and many other basic necessities. Additionally, laws related to settling industrial disputes, occupational safety, health and working conditions of workers, and those related to trade unions, contract workers, and migrant labourers are rendered defunct.

We support the call for public protest and strike made by the national trade unions. Some of their demands to the government include:

      A cash transfer of rupees 7,500 per month for the next 5 months for all non-income taxpayers.

      Universalisation of ration.

      Increase in the amount directly transferred to Jan Dhan accounts. 

      Repeal of ordinances and orders that annul hard fought rights of labour.

The global pandemic has led to the dilution of  systems of governance, transparency and accountability, participatory democracy, and the guarantee of rights in crisis. The livelihoods of millions of people are under threat because of Covid-19, and the Indian State governments are ruthlessly taking advantage by ramming through ordinances and orders circumventing labour laws. As a result labourers and working class may be rendered with no choice but to accept paltry wage and inhuman working conditions to survive.

Though successive governments have compromised on the rights of the worker in the neoliberal rush for economic growth and increased investment, the situation has never before been this alarming. Many rights for workers have been won through collective mobilisation and struggle, which is now made impossible during the lockdown. The suspension of fundamental rights in the absence of normal modes of dissent and legal recourse is unconstitutional and immoral. In the name of encouraging investment and boosting the economy, a country cannot forsake the most marginalised worker.

The MKSS condemns the state-sanctioned exploitation of labour and the working class, and will be joining today’s strike. As countries across the world rapidly shift to increase labour security through measures such as wage subsidies, it is a matter of shame that the Indian state is trying to suspend the rights and protection offered to a large section of the Indian labour force. We will continue to actively resist the nexus of government with capitalists that does not have consideration for the plight of the working poor. We demand that all labour laws be reinstated, and that all governments ensure that the poor are able to live and work with dignity.

‘ग्रामीण क्षेत्र में हर व्यक्ति को रोजगार की गारंटी दी जाये’- अरुणा रॉय

‘शहरी रोज़गार गारंटी कानून बनाया जाये’- निखिल डे

भीम, 1 मई 2020

कोरोना महामारी की वजह से अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस व मजदूर किसान शक्ति संगठन का 30वां स्थापना दिवस वर्चुअली (ऑनलाइन) मनाया गया जिसमें राजस्थान सहित पूरे देश के संगठन व यूनियन से जुड़े साथियों ने भाग लिया. आज कोरोना महामारी के समय में देश का सबसे बड़ा तबका, मजदूर, कोरोना से तो लड़ ही रहा है, पर  उसके साथ-साथ भय, भूख और रोज़गार के संकट से भी जूझ रहा है. हम सभी जानते हैं, कि कुल मजदूरों के  93% प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है. वे गरीबी से भयंकर रूप से लड़ रहे हैं. अधिकतर प्रवासी मजदूरों के पास खाने को कुछ नहीं है और जरुरत के अन्य सामान खरीदने के लिए कुछ भी नहीं बचा है. इस संकट के समय में मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है, जितने दिन उन्होंने काम किया, उन्हीं दिनों का भुगतान नहीं किया गया है तो लॉकडाउन के दौरान का भुगतान मिलना तो उनके लिए शायद सपने जैसा ही है.

आज मई दिवस की ऑनलाइन शुरुआत करते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक सदस्य और सामाजिक कार्यकर्त्ता अरुणा रॉय ने कहा कि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर शहरों से लौटकर गाँव की ओर जा रहे हैं. इसलिए, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी रोज़गार कार्यक्रम के अंतर्गत जो भी वयस्क, जितने भी दिनों के लिए काम मांगता है, उसे उतने दिन काम दिया जाये. ये ऐसा समय है जब ग्रामीण क्षेत्र में हर वयस्क को काम की आवश्यकता है.  

आज के इस कार्यक्रम में राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की राज्य अध्यक्षा नौरतीबाई, जो 80 के दशक से असंगठित क्षेत्र के मजदूर हकों के लिए संघर्षरत हैं, ने कहा कि कोरोना महामारी ने मजदूरों के लिए एकता का एक बार फिर मौका दिया है क्योंकि इस समय में सबसे अधिक भेदभाव मजदूरों के साथ ही किया जा रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने संकट के इस समय में शहरी रोज़गार गारंटी कानून बनाये जाने की मांग रखी क्योंकि अभी शहरों में लोगों के पास कोई काम नहीं है. पहले भी बहुत लोगों के पास काम नहीं था लेकिन अब तो शहरी क्षेत्र में काम दिए जाने की सख्त आवश्यकता है.

संगठन के पुराने साथियों ने एक मई को आयोजित होने वाले मेले के बारे में अपने अनुभव साझा किये, वैसे भी पिछले 30 वर्षों में यह पहला मौका है जब यह मेला नहीं हुआ है. इस मेले में हजारों की तादाद में लोग आते हैं और ये लोगों के लिए एक आदत बन गई है, कि एक मई को पाटिया के चौड़े, भीम जिला राजसमन्द में मजदूरों का मेला होगा. लोग मेले में आते हैं और मंच से चल रही बातचीत तो सुनते ही हैं, बहुत सस्ते भाव पर मिलने वाला सामान भी खरीदते हैं और आनंदित होते हैं.

इस मजदूर मेले के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और रोज़गार के लिए जो आन्दोलन हुए, उनके इतिहास पर भी बात हुई क्योंकि यह मजदूर मेला सूचना के अधिकार, राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी सहित कई अन्य कानूनों के लिए हुए आन्दोलनों का गवाह रहा है. इस मेले के दौरान स्थानीय लोगों ने जो मुद्दे उठाये, वे राष्ट्रीय पटल तक गए और उ मुद्दों पर आगे जाकर कानून बने.

इस मौके पर प्रसिद्द समाज विज्ञानी सतीश देशपांडे ने कोरोना काल में मजदूरों की समस्याओं पर ध्यान आकर्षित किया. वहीँ मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पीयूसीएल की राज्य अध्यक्षा कविता श्रीवास्तव ने लॉकडाउन की वजह से हो रहे मजदूरों और अन्य लोगों पर मानवधिकार दमन के मामलों पर प्रकाश डाला. उन्होंने यह भी कहा कि लॉकडाउन के दौरान हुए दमनों ने आपातकाल के दौरान हुए दमनों को भी पीछे छोड़ दिया है. हमारे साथ दक्षिण एशिया जानी मानी महिला अधिकार कार्यकर्ता कमला भसीन भी शामिल हुईं और उन्होंने मई दिवस मेले को याद करते हुए, अनेक वर्ग, उम्र, दृष्टिकोण के साथियों का एक संगम सामान कहा.

मीटिंग में लोकतंत्रशाला के सचिव लाल सिंह, रेनी, नवाज, मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्य शंकर सिंह, नारायण सिंह, करुणा मुथैया, मृदु शर्मा, विनीत, लक्ष्मी चौहान, मीराबाई, रूपसिंह, सौम्या किडाम्बी, नचिकेत, पारस बंजारा, दिग्विजय सिंह, सबा, प्राविता कश्यप, श्रेणिक मुथा, जननी श्रीधरन, कालूराम, रुकमनी देवी, अमित शर्मा, अविनाश, ब्रह्मचारी, अनुमेहा, राधिका गणेश, रक्षिता स्वामी, नंदिनी, शुभांगी शुक्ला, लक्ष्मण सिंह, रतन, शीलू, दीपू, एवं अन्य सभी कार्यकर्ता जुड़े तथा पेंशन परिषद् से नैंसी, भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति से कोमल श्रीवास्तव, सूचना का अधिकार मंच से कमल टांक,  सूचना के जन अधिकार के राष्ट्रीय अभियान से भास्कर प्रभु, असमी शर्मा, मजदूर किसान किराना स्टोर से मोहन सिंह, गोपाल सिंह, जन आन्दोलनों के समन्वय से अखिल चौधरी, मानवाधिकार संगठन पी यू सी एल से शुभा, राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन के राज्य सचिव बालुलाल, मुकेश गोस्वामी, निखिल शेनॉय, नोरतमल, कार्तिक सिंह, ईश्वर सिंह, कमलराज, सिमरन, हेमलता, माया, कनिका,व अन्य कई कार्यकर्त्ता जुड़े.

बालूलाल, रूपसिंह, निखिल शेनॉय, विनीत, कार्तिक, ईश्वर, लक्ष्मण, मुकेश, शुभांगी एवं अन्य सभी साथी

मजदूर किसान शक्ति संगठन और राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की ओर से

पालघर जैसी म़ोब लिंचिंग की घटनाओं पर पुख्ता रोक लगाई जाये और मोब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाये.

मजदूर किसान शक्ति संगठन महाराष्ट्र के पालघर जिले में दिनांक 16 अप्रेल 2020 को भीड़ द्वारा संत कल्पवृक्षगिरी, सुशीलगिरी व ड्राईवर निलेश तेलगाड़े, की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की गई हत्या की कड़ी निंदा करता है | कल्पवृक्षगिरी 70 वर्ष के थे और सुशीलगिरी 35 वर्ष के थे ये दोनों श्री श्री पंच जूना अखाडा से जुड़े हुए थे | निलेश तेलगाड़े उनकी गाड़ी के ड्राइवर थे | इस भीभत्स घटना में महाराष्ट्र पुलिस के 2 पुलिस वाले भी बुरी तरह घायल हुए हैं | स्थानीय आदिवासियों के बीच यह अफवाह थी कि छोटे बच्चो को उठाने वाले गिरोह के ये लोग सदस्य हैं|  महाराष्ट्र सरकार ने अब तक 100 से भी अधिक आदिवासियों को इस तिहरे हत्याकांड में गिरफ्तार किया है I हमारी मांग है कि जल्द अदालत में चालान दायर कर जल्द ट्रायल कर इस तिहरे लिंचिंग द्वारा किये गए हत्याकांड में न्याय दिलवाया जायेI  महाराष्ट्र प्रदेश सरकार राज्य में म़ोब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाएंI

केंद्र सरकार म़ोब लिंचिंग के विरुद्ध कानून लाये और राज्यों द्वारा पारित विधेयकों को तुरंत राष्ट्रपति से सहमति दिलवाएं

वैसे गाय के नाम पर 2014-15 से शुरू हुई पीट-पीटकर मार डालने की घटनायें अब देशभर में फ़ैल चुकी हैं केवल शक के नाम पर कोई भी इसका शिकार हो सकता है | इन्हीं 5 सालों में सबसे ज्यादा भीड़ द्वारा हत्याएं गाय के नाम पर हुई है और एक विशेष समुदाय के लोग शिकार हुए हैI लेकिन यह म़ोब लिंचिंग की घटनाएँ, कभी गाय को लेकर तो कभी बाल काटने के नाम पर, तो कभी बच्चा उठाने के नाम पर जन भावनायें भड़काई जाती हैI  साथ में इस तरह की भीड़ को राजनीतिक समर्थन भी भरपूर मिला है, जिससे भीड़ की अराजकता बढती जा रही है पिछले 5 सालो में यह घटनाएँ बढ़ ही रही हैं और लगभग 120 लोग मारे गए हैं | 

अब समय आ गया है कि  भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने की घटनाओं से निबटने के लिए 2018 में उच्चतम न्यायलय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों को केंद्र व राज्य सरकारों को लागू करना चाहिए I जिसमें विशेष कानून बनाये जाने के लिए आदेशित किया गया है। केंद्र सरकार ने तो अभी तक कोई कानून नहीं बनाया और जिन राज्यों ने, जैसे मणिपुर, राजस्थान, पश्चिम बंगाल की राज्य विधानसभाओं ने कानून भी पारित किये हैं लेकिन उन्हें राष्ट्रपति महोदय ने अभी तक अपनी मंजूरी नहीं दी है I

देश में अमन शान्ति बनाये रखने के लिए  और धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने की चेष्टा करने वालों के विरुद्ध सख्त क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय को तुरंत लंबित विधेयकों को तत्काल महामहिम राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवाकर इन्हें कानूनी रूप देने में मदद करनी चाहिए और म़ोब लिंचिंग के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर पुख्ता कानून लाया जाये जिससे कि देश में भारी अराजकता रोकी जाए I 


अरुणा रॉय, शंकर सिंह, निखिल डे एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन के सभी साथी

मजदूर किसान शक्ति संगठन की ओर से

Tab Content

Press Release


The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan stands in complete solidarity with those participating in the Mazdoor Kisan Sangharsh Rally and unilaterally supports and reiterates all the demands raised by it.

The current Government has taken systematic measures to undermine democratic, social and economic rights of citizens that are protected under the Indian Constitution and furthered by a slew of legislations that emerged out of sustained peoples’ campaigns and movements. We support the All India Kisan Sabha and all participants of the Sangharsh Rally in exposing the BJP Government for taking a slew of anti-farmer and anti-worker measures such as non-implementation of the Forest Rights Act; non-implementation of recommendations of the Swaminathan Commission; rolling back from its promise on loan waivers, job creation and introducing anti-labour legislations and violating the Minimum Wages Act. This systematic undermining of the rights of the most marginalized and deprived sections of our society that include agricultural workers, small and marginalized farmers, women, Dalits and adivasis is a concerted attack by the current Government.

We resolve to stand in solidarity with the lakhs of citizens, campaigns, networks and peoples’ movements to highlight and protest against the unjust and unconstitutional policies of the State, through peaceful and democratic means. Over the next two months, we will also

participate in the Pension Parishad Rally and Jan Manch, that is coming together to demand for universal social security to the unorganised sector on the 30th of September and the 1st of October. Ekta Parishad is also coming together in a massive march to demand peoples’ rights over homestead and agricultural lands, and there has also been a call for action by multiple groups to demand a special session of Parliament to discuss the current acute distress in the agriculture sector and immediate measures to be taken to address it.

When the policies of the Government don’t change for the people, the people will resolve to change the Government.

‘Nyay samaanta ho aadhar, aisa rachenge hum sansaar!”

– Aruna Roy, Nikhil Dey and Shankar Singh on behalf of the Mazdoor Kisan Shakti Sangathan, Rajasthan

प्रेस विज्ञप्ति

धूमधाम से मनाया नरेगा दिवस

नरेगा मजदूरी 500 रुपये प्रतिदिन एवं 200 दिन की गारंटी की जाये

2 फरवरी 2019, जवाजा, अजमेर

आज दिनांक 2 फरवरी 2019 को राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन द्वारा नरेगा दिवस मनाया गया जिसमें अजमेर जिले की जवाजा पंचायत समिति, पाली जिले की रायपुर पंचायत समिति की विभिन्न ग्राम पंचायतों के 500 से अधिक मजदूरों ने हिस्सा लिया. आप सभी को विदित है की आज ही के दिन 2 फरवरी 2006 को महात्मा गाँधी नरेगा की देश के अति पिछड़े 200 जिलों में शुरुआत हुई थी. महात्मा गाँधी नरेगा को आज 13 वर्ष पूर्ण होने पर मजदूरों ने जमकर ख़ुशी मनाई. इस मौके पर महात्मा गाँधी नरेगा के लिए हुए आन्दोलन के इतिहास के बारे में विस्तार से बताया गया और विभिन्न मजदूरों और पदाधिकारियों ने अपनी बात रखी.

अधिकार आधारित नरेगा को बना दिया स्थानीय प्रशासन की मर्जी

आसन ग्राम पंचायत के रानौता गांव से आई पूजा ने बताया कि हमारे गांव में पिछले साल कई सालों के बाद नरेगा की शुरुआत हुई उससे पहले सचिव सरपंच ही नरेगा लाते थे लेकिन आज गांव के मजदूर ग्राम पंचायत में जा रहे हैं नरेगा के लिए आवेदन का फार्म नंबर 6 भर रहे हैं और काम मांग रहे हैं इससे स्थानीय प्रशासन के ऊपर दबाव बना है और अब वह ठीक से काम करने लगे हैं. लोगों को जो काम दिया जाता है उसे पूरा करते हैं और पूरा दाम (नरेगा में निर्धारित मजदूरी) ही लेते हैं. उन्होंने बताया कि यूनियन से जुड़े हुए सभी सदस्य नरेगा में निर्धारित विभिन्न टास्क के अनुसार काम करते हैं और वे उम्मीद करते हैं कि उनको नरेगा में निर्धारित पूरी मजदूरी मिले लेकिन कई जगहों पर स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और मजदूरों को पूरी मजदूरी नहीं देने की नियत एवं स्थानीय प्रशासन को भ्रष्टाचार का मौका नहीं मिलने के कारण मजदूरों की मजदूरी काटी जाती है. वे यह सब इसलिए करते हैं क्योंकि मजदूरों में निराशा पैदा हो और वह पूरा काम करने के लिए उत्साहित नहीं हों.

मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्य एवं वरिष्ठ रंगकर्मी शंकर सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि नरेगा आईसीयू में है और उसके डॉक्टर सभी मजदूर या उस में काम करने वाले लोग हैं, उन्होंने कहा कि यह गरीबों और वंचितों के लिए बहुत अच्छा कार्यक्रम है लेकिन स्थानीय प्रशासन की उदासीनता और भ्रष्ट लोगों की वजह से नरेगा में पूरा काम करने वाले लोगों को पूरी मजदूरी नहीं मिलती क्योंकि जो पूरा काम करते हैं और काम बहुत कम करते हैं या बिलकुल भी नहीं करते हैं या जो काम पर उपस्थित भी नहीं होते हैं उन सब को प्रशासन की तरफ से एक ही मजदूरी की दर दे दी जाती है इससे मजदूरों में निराशा का भाव पैदा करती है और इसकी वजह से विगत कई वर्षों में नरेगा का बुरा हाल हुआ है इसलिए यूनियन पूरा काम और पूरा दाम के सिद्धांत पर राज्य के 4 जिलों में काम करवा रहा है वह एक सराहनीय कदम है. सभा को सामाजिक कार्यकर्ता सुशीलाबाई ने संबोधित किया और कहा कि इस कानून के लिए घाघरा पलटन (महिलाओं) आंदोलन किया था और यह घाघरा पलटन ही नरेगा को ठीक से चलाकर दिखायेंगे.

सभा में उपस्थित यूनियन के राज्य कोषाध्यक्ष रूप सिंह ने बताया कि वे पाली जिले की रायपुर पंचायत समिति की विभिन्न ग्राम पंचायतों में पूरा काम पूरा दाम के सिद्धांत पर नरेगा में काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, उन्होंने बताया की जब वे कलालिया ग्राम पंचायत में पूरा काम करके पूरा दाम के लिए काम कर रहे थे तो उस ग्राम पंचायत एन कुछ दिन तो स्थानीय प्रशासन ने पूरा काम करने पर पूरा दाम दिया लेकिन स्थानीय प्रशासन को लगा कि नरेगा में भ्रष्टाचार बिल्कुल बंद हो जाएगा इसलिए उन्होंने मजदूरों के पूरा काम किए जाने पर 94 रुपये प्रतिदिन की मजबूरी दे दी. जब उसका विरोध किया और मजदूरी नहीं लिए जाने तथा इसकी शिकायत आयुक्त नरेगा को किए जाने पर उस ग्राम पंचायत में पंचायत समिति स्तर से संविदा कर्मी रोजगार सहायक और कनिष्ठ तकनीकी सहायक के खिलाफ कार्रवाई हुई और उन्हें हटा दिया गया. इस सबके बाद कलालिया ग्राम पंचायत में सरपंच पति और ग्राम रोजगार सहायक ने मुझे धमकाना शुरू किया और कई अन्य लोगों से भी धमकियाँ दिलवाई कि तुम्हें जान से मार दिया जाएगा लेकिन इस प्रकार की धमकी से हम हार नहीं मानने वाले हैं ये लड़ाई हम लड़ेंगे. सभा में उपस्थित और उनके साथ कलालिया बगड़ी और अन्य ग्राम पंचायतों से आए ग्राम वासियों ने उनको पूरा साथ देने का ऐलान किया.

सरकारी कर्मचारियों, अधिकारीयों और जन प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय हो

यूनियन की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मुकेश गोस्वामी ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों की तनख्वाह वर्ष में दो बार बढ़ जाती है लेकिन मजदूरों की पिछले साल नरेगा में एक भी रुपया नहीं बढ़ा. इसी प्रकार जो मजदूरी तय की जाती है वह भी बहुत कम है जबकि सरकारों में स्थित मुख्यमंत्री एवं प्रधानमंत्री को भी बहुत अधिक वेतन मिलता है इसलिए हमें जीवन निर्वाह के लिए उचित मजदूरी की मांग रखनी चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार नरेगा मजदूरों को निर्धारित टास्क पूरा करना पड़ता है तभी उनको पूरी मजदूरी मिलती है उसी प्रकार सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए. नरेगा दिवस के अवसर पर यूनियन की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य निखिल शिनॉय ने मजदूरों से अपील की कि हम कहीं पर भी एक रुपया कम नहीं लेंगे और ये लड़ाई हम सब साथ मिलकर लड़ेंगे.



असंगठित मजदूर यूनियन का होगा विस्तार

राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन के राज्य के उपाध्यक्ष केसर सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह यूनियन केवल अजमेर, पाली, राजसमंद या भीलवाड़ा जिले तक ही सीमित नहीं रहेगी हम इस यूनियन के काम को संपूर्ण राजस्थान में ले जायेंगे. उन्होंने आगे कहा कि हम यूनियन के काम में केवल नरेगा श्रमिकों तक सीमित नहीं रहेंगे हम अन्य मजदूर जैसे रेहड़ी-पटरी, हमाल( पल्लेदार) खेतिहर,  निर्माण व घरेलू आदि श्रमिको को इस यूनियन के साथ जोड़ेंगे और एक बड़ा कारवां बनेगा. सभा को यूनियन के संभागीय सचिव महेंद्र सिंह उर्फ़ कार्तिक ने संबोधित किया और उन्होंने कहा कि हम यूनियन का विस्तार नागौर और भीलवाड़ा जिले में भी जल्दी ही करेंगे.


मजदूरों ने लिए संकल्प और किये प्रस्ताव पास

सभा में उपस्थित 500 से अधिक मजदूरों ने आज यह संकल्प लिया कि वे नरेगा को हर हालत में ठीक करेंगे और राज्य के हर गांव और पंचायत में स्वयं जाकर मजदूरों को पूरा काम करने के लिए प्रेरित करेंगे और किसी भी हालत में पूरी मजदूरी से कम नहीं लेंगे यह संदेश राज्य के कोने-कोने तक पहुंचाएंगे. कार्यक्रम के अंत में यूनियन की जवाजा पंचायत समिति स्तरीय कार्यकारिणी का गठन किया गया जिसमें रज्जूदेवी को सर्वसम्मति से अध्यक्ष, तुलसी देवी को उपाध्यक्ष, पूजादेवी को सचिव व हेमलता को कोषाध्यक्ष चुना गया. कार्यकारिणी के 4 अन्य सदस्य चुने गये जिनमें बंजारी से भगवती व सुरडिया से सीतादेवी को चुना गया. यूनियन की तरफ से अंत में निखिल शिनॉय ने प्रधानमंत्री एवं राज्य के मुख्यमंत्री को भेजे जाने वाले ज्ञापन के लिए की जाने वाली मांगे और प्रस्तावों को पढ़कर सुनाया गया जो प्रस्ताव लिए गए वह निम्न प्रकार है:-

  1. महात्मा गाँधी नरेगा में कम से कम 500 रुपये प्रतिदिन मजदूरी की जाये.
  2. महात्मा गाँधी नरेगा में 200 दिन की गारंटी की जाये.
  3. केंद्र सरकार नरेगा के लिए 6000 करोड़ रुपये सत्र 2018-19 के लिए तुरंत रिलीज़ किया जाये.



महेंद्र सिंह उर्फ़ कार्तिक

संभागीय सचिव अजमेर, राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन 

Mazdoor Kisan Shakti Sangathan

Village – Devdungri, Post – Barar,

District – Rajsamand, Rajasthan, India – 313341

Website –

Facebook –

Twitter –

4 Attachments


Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) Village Devdungri,

Post Barar 313341, District Rajsamand, Rajasthan

Statement Condemning State Response to Protests 


The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) is shocked and dismayed at the reaction of the State in dealing with the protests at North Block on 22nd December 2012. This is against a backdrop of the most brutal gang rape and attack on an innocent 23 year  old girl on 16th December 2012, which still stands basically unaddressed despite promises of fast tracking justice.  The protest is to be understood as a method of expressing anxiety, anger and angst of 50 percent of the Indian population against an apathetic state.


The State has lost its capacity to address events such as this immediately and with responsibility. It stands to reason that strong emotions and reactions from people are inevitable and that it needs to be handled through dialogue and sympathy. Every woman and the parents of every young woman now live under the uncertainty of attack and insurmountable pain. Every woman empathizes and identifies with violence on another, and  it has been reassuring to see men with women protest against brutality and deliberate violence on innocent people.  


Curbing such protests with violence by the State is no answer. Many of the placards of the protestors demand maturity of response. The answer does not lie in introducing the death penalty but in delivering faster and more effective justice for the victim. This spiraling frustration is fuelled to make dissenters  demand more and more , including  violent  punishment. What will make a peaceful and safe society for women is  the daily resolution of violence in its  smaller and bigger manifestations.  It is the responsibility of the State to deal with these sentiments immediately, beginning with accepting its responsibilities. 


 This incident has to be seen as the last in a series of continuous escalating intimidation of people   by the state.  While pleading helplessness in resolving criminal action it is quick to repress non violent protests. This is therefore to be seen as a continuation of a series of such actions.  (Dayamani Barla, from Jharkhand was granted bail after months in jail, only yesterday for protesting against forcible land acquisition and the demand for MGNREGA job cards. The brutal crack downs in  Kudankulam on the peaceful protests against the nuclear power plant will continue to be a shame for our democratic country.) 


The State would do well to acknowledge its own inadequacies and redress violence by quick remedial action. That alone can bring the growing trend of violence against women in multiple forms under control. Whether it is Khap panchayats or feoticide, the machismo of a regressive society is fostered and promoted by such actions. 


The MKSS strongly opposes the crackdown on protestors and calls for an immediate platform to be created to dialogue with the protests  accepting accountability  and to find methods of effective resolution.


Aruna Roy, Nikhil Dey, Lal Singh, Bhanwar Meghwanshi, Narayan and Shankar Singh, (for the MKSS )

23rd December 2012

Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) Village Devdungri,

Post Barar 313341, District Rajsamand, Rajasthan

Statement Condemning Arrest of Dayamani Barla


The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) strongly condemns the arrest of Dayamani Barla from Jharkhand, National Co-Convener of the National Alliance of People’s Movements (NAPM) and Executive Committee Member of the India Social Action Forum (INSAF). Dayamani has been a leader of various people’s movements and campaigns across India and has been repeatedly threatened for her democratic protests against land acquisition in Nagari, Jharkhand. 


The police have reopened an earlier case registered in 2006, when she spent fourteen days in Judicial Custody, after being charged under various sections of the Indian Penal Code, including Section 148 (rioting, armed with deadly weapon). She was participating in a protest demonstration, which blocked the road, demanding job cards for rural laborers under the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA). She was arrested again this month, and when granted bail on 19th October by a local court of Ranchi, was immediately arrested in a new case, the details of which the Jail authorities refuse to disclose due to ‘technical reasons’, and remains in jail as of now.


This intimidation is due to the peaceful peoples protest against the acquisition of fertile agricultural land at Nagari, a village situated a few kilometers from Ranchi, supporting 500 tribal families. The land was acquired in 1957-58 for building a seed farm for the Birsa Agricultural University, which did not get built, and was later allotted, to IIM and NUSRL by the Jharkhand Government.


A Right to information (RTI) application filed by the villagers has revealed that in 1957 (in the then unified Bihar), of the 153 families whose land was acquired, only 25 took the compensation at a rate of Rs 2,700 an acre. The remaining families declined the compensation offered. Further, the land was then acquired under the urgency clause and there has been no work for 50 years. There is also a 1,900-acre wasteland nearby in Kanke, which the villagers suggest be used instead. 


The protest against this land acquisition has been going on since April, when a group of women and Dayamani Barla sat on dharna. Their case was lost in the High Court, with the court failing to take cognizance of its own constitutional law whereby agricultural land, especially under the Fifth Schedule, and in Jharkhand as per the Chotta Nagpur Tenancy Act, should not be acquired for non-agricultural purposes. The Supreme Court too has dismissed the villager’s petition. The villagers are not allowed within one kilometre of the project land as Section 144 has been imposed. The construction site is manned by the Rapid Action Force (RAF) of Jharkhand police.


This is not an isolated case, but part of a larger series of intimidation tactics used by the State to silence peaceful, democratic protest by people asking for their rights and exercising their civil liberties. We demand that Dayamani Barla be released immediately, and there is a full review of this acquisition process, with due compensation to be given and process to be followed.

Aruna Roy, Nikhil Dey, Lal Singh, Bhanwar Meghwanshi, Narayan and Shankar Singh, (for the MKSS )

30th October 2012

 Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) Village Devdungri,          

Post Barar 313341, District Rajsamand, Rajasthan



      Statement Condemning the Zila badar Show Cause Notice on Madhuri Krishanswami, Jagrut Adivasi Dalit Sangathan


The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan ( MKSS ) strongly condemns the show cause notice and initiation of proceedings of externment (zila badar) against Madhuri Krishanswami of Jagrut Adivasi Dalit Sangathan from six districts of Madhya Pradesh. This Sangathan has been campaigning for over 14 years for the realization of the constitutional and legal rights of adivasis in Barwani, Madhya Pradesh, one of the most backward districts of the country. They have spread awareness and put pressure on local public authorities, demanding proper implementation of MGNREGA and food schemes, proper health care, rights of gram sabhas, forest rights, and campaigned against the sale of illegal liquor etc. As a direct result of their efforts, between October to December 2006, adivasi NREGA workers in Barwani district were paid unemployment allowances, totaling Rs 4,75,386/ . This has been done through a series of democratic modes such as awareness campaigns, public meetings and peaceful agitations, such as dharnas. The consequent exposure of corruption by government functionaries has resulted in this severe backlash against the Sangathan and its member, Madhuri Krishanswami.


This externment orders have been issued under the Madhya Pradesh Security Act, 1990 which on paper, is intended to protect the rights of tribal groups against “antisocial elements and previous convicts”. In a perverse and arbitrary interpretation, this has been used against Ms. Madhuri Krishnaswami who has been working for over a decade to empower the tribals to organize to demand their legal and constitutional rights and transparency, accountability and delivery of essential services from state mechanisms.


Jagrut Adivasi Dalit Sangathan, in a statement issued today, demanded that the externment order be revoked immediately. They stressed that if externment orders were to be issued at all, they should be directed towards corrupt government officials and not to the community and its leaders. The MKSS strongly condemns the use of ‘externment orders’, which was a tool of repression used by the Colonial State as a means of subjugating the population and its leaders. This concept should be done away with from our legislations and administration.In any case, the show cause notice and externment proceedings against Madhuri Krishnaswami must be immediately withdrawn. 


Such pressure tactics by the State, are anti constitutional, anti democratic, and are an obvious indication of vested interests misusing the law to exploit tribal communities and undermine their support structures. Not only is this an affront to democratic spaces for functioning and dissent, but it violates basic human rights. We demand that this is enquired into by the state and central governments, the human rights commission, and, the externment orders be revoked. The Sangathan must be allowed to operate within democratic constructs, and its efforts to secure the legal and constitutional rights of Dalits and Adivasis must be protected. 


Aruna Roy, Nikhil Dey, Bhanwar Meghwanshi  and Shankar Singh,  (for the MKSS )         25th May 2012

 Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) Village Devdungri,          

Post Barar 313341, District Rajsamand, Rajasthan

Press Statement Condemning Kidnapping of Sukma Collector

The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan strongly condemns the kidnapping of Mr. Alex Menon, the collector of Sukma region by Maoists on 21st April 2012. Such acts of aggression are unacceptable and seriously impede the democratic processes that are vital to the functioning of the government and State. It is all the more unfortunate that Mr. Menon was kidnapped while he was attending a Gram Suraj Abhiyaan, which is a state government-run programme meant to promote interaction between local administration and citizens. We also condemn the killing of his two personal security officers during the abduction. Mr. Menon is also asthmatic, and according to his wife has only two dosages with him. We demand that he be released immediately and unconditionally. 

In this context, it is important to acknowledge that the basic issues need to be addressed for any lasting solution to the accelerating violence. The Maoists have continued to release  charters of demands not only during abductions, but at other times. These demands include a halt in military operations by the State, a halt to fake encounters and judicial inquiries into the killings under past encounters, stopping indiscriminate arrests of villagers, compensation for destruction of crops and killing and looting of livestock, removal of security forces from the area, punishing police personnel responsible for destruction of villages and cancelling of all MoUs with private corporations in tribal areas. Despite the fact that many of these demands require serious consideration, there has been no review, no public debate and no initiative or assurances by the State with regard to the issues raised. Some have been reiterated by civil liberties groups, particularly the implementation of the Supreme Court orders in the Salwa Judum case.

Given the context of this ongoing aggression, the government has an obligation to initiate and pursue a dialogue with all concerned parties. Avenues for dialogue will have to be found to address the cause of the conflict.  Dialogue will also reaffirm the wisdom of developmental solutions over military ones, and draw clarity on what mode of development the people of that area want. It is imperative therefore that genuine attempt by the State be made to engage in dialogue to address issues and prevent unacceptable acts of aggression.

Aruna Roy, Nikhil Dey, Bhanwar Meghwanshi  and Shankar Singh

(for the MKSS collective)          


The MKSS strongly condemns the illegitimate police raid on noted human rights activist and PUCL general secretary, Kavita Srivastava’s home. This raid was clearly meant to intimidate Kavita and pass a message to all human rights activists not to take up causes against the State. In any case, there was no cause to rough up her elderly father and aggressively intimidate domestic help.

The government needs to realize it is extremely short-sighted to intimidate people who may raise crucial though uncomfortable questions since human rights activists play a crucial role in ensuring that constitutional principles are adhered to in the country.

We demand that the police put all the information related to this search warrant in the public domain and issue an apology for their high-handed behaviour.

We demand that the government and police authorities ensure that such incidents aren’t repeated.


Aruna Roy, Nikhil Dey, Shankar Singh for the MKSS Collective

Dated: October 3, 2011