The Mazdoor Kisan Shakti Sangathan (MKSS) and Rajasthan Asangathit Mazdoor Union (RAMU), strongly condemn the various State governments’ callous decisions to dilute or suspend labour laws. We stand in solidarity with the nationwide strike by Trade Unions on May 22, 2020, against the Centre and States’ regressive steps.

The Covid-19 pandemic and the subsequent poorly planned government-imposed lockdown has resulted in a dire situation for labour and working classes, who find themselves unemployed with no social security. In the midst of such a human calamity, instead of ensuring the fundamental rights and protections of workers, the governments of Uttar Pradesh, Madhya Pradesh and Gujarat have adopted draconian measures that exempt businesses and corporate establishments from providing workers with basic amenities for roughly the next 3 years. Additionally, the governments of Rajasthan, Punjab, Haryana, Goa, Himachal Pradesh, Odisha and Uttarakhand have relaxed sections of the Factories Act, 1948, thereby allowing increased working hours from 9 hours to 12 hours per day.

These are regressive, undemocratic and unconstitutional steps. Labour laws have historical precedence in worker mobilisations since pre-independence. The right against exploitation is a fundamental right enshrined in the Indian Constitution (Articles 23 and 24). Instead of providing adequate relief to a section of society languishing during the lockdown – the poor and working class – these State governments have chosen to promote the interests of capitalist classes. The MKSS fears that this abrogation of labour rights will take the States back to feudal, dehumanising and slave-like conditions for the poor worker.

The ordinance passed by Uttar Pradesh and promulgated by Madhya Pradesh and Gujarat propose to exempt factories, businesses and other establishments from the purview of most labour laws regulating work conditions. This effectively denies employees mandatory provision of toilets, drinking water, rest breaks, weekly holidays, sitting facilities, protective equipment, medical aid, and many other basic necessities. Additionally, laws related to settling industrial disputes, occupational safety, health and working conditions of workers, and those related to trade unions, contract workers, and migrant labourers are rendered defunct.

We support the call for public protest and strike made by the national trade unions. Some of their demands to the government include:

      A cash transfer of rupees 7,500 per month for the next 5 months for all non-income taxpayers.

      Universalisation of ration.

      Increase in the amount directly transferred to Jan Dhan accounts. 

      Repeal of ordinances and orders that annul hard fought rights of labour.

The global pandemic has led to the dilution of  systems of governance, transparency and accountability, participatory democracy, and the guarantee of rights in crisis. The livelihoods of millions of people are under threat because of Covid-19, and the Indian State governments are ruthlessly taking advantage by ramming through ordinances and orders circumventing labour laws. As a result labourers and working class may be rendered with no choice but to accept paltry wage and inhuman working conditions to survive.

Though successive governments have compromised on the rights of the worker in the neoliberal rush for economic growth and increased investment, the situation has never before been this alarming. Many rights for workers have been won through collective mobilisation and struggle, which is now made impossible during the lockdown. The suspension of fundamental rights in the absence of normal modes of dissent and legal recourse is unconstitutional and immoral. In the name of encouraging investment and boosting the economy, a country cannot forsake the most marginalised worker.


The MKSS condemns the state-sanctioned exploitation of labour and the working class, and will be joining today’s strike. As countries across the world rapidly shift to increase labour security through measures such as wage subsidies, it is a matter of shame that the Indian state is trying to suspend the rights and protection offered to a large section of the Indian labour force. We will continue to actively resist the nexus of government with capitalists that does not have consideration for the plight of the working poor. We demand that all labour laws be reinstated, and that all governments ensure that the poor are able to live and work with dignity.


पालघर जैसी म़ोब लिंचिंग की घटनाओं पर पुख्ता रोक लगाई जाये और मोब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाये.

मजदूर किसान शक्ति संगठन महाराष्ट्र के पालघर जिले में दिनांक 16 अप्रेल 2020 को भीड़ द्वारा संत कल्पवृक्षगिरी, सुशीलगिरी व ड्राईवर निलेश तेलगाड़े, की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर की गई हत्या की कड़ी निंदा करता है | कल्पवृक्षगिरी 70 वर्ष के थे और सुशीलगिरी 35 वर्ष के थे ये दोनों श्री श्री पंच जूना अखाडा से जुड़े हुए थे | निलेश तेलगाड़े उनकी गाड़ी के ड्राइवर थे | इस भीभत्स घटना में महाराष्ट्र पुलिस के 2 पुलिस वाले भी बुरी तरह घायल हुए हैं | स्थानीय आदिवासियों के बीच यह अफवाह थी कि छोटे बच्चो को उठाने वाले गिरोह के ये लोग सदस्य हैं|  महाराष्ट्र सरकार ने अब तक 100 से भी अधिक आदिवासियों को इस तिहरे हत्याकांड में गिरफ्तार किया है I हमारी मांग है कि जल्द अदालत में चालान दायर कर जल्द ट्रायल कर इस तिहरे लिंचिंग द्वारा किये गए हत्याकांड में न्याय दिलवाया जायेमहाराष्ट्र प्रदेश सरकार राज्य में म़ोब लिंचिंग के खिलाफ सख्त कानून बनाएंI

केंद्र सरकार म़ोब लिंचिंग के विरुद्ध कानून लाये और राज्यों द्वारा पारित विधेयकों को तुरंत राष्ट्रपति से सहमति दिलवाएं

वैसे गाय के नाम पर 2014-15 से शुरू हुई पीट-पीटकर मार डालने की घटनायें अब देशभर में फ़ैल चुकी हैं केवल शक के नाम पर कोई भी इसका शिकार हो सकता है | इन्हीं 5 सालों में सबसे ज्यादा भीड़ द्वारा हत्याएं गाय के नाम पर हुई है और एक विशेष समुदाय के लोग शिकार हुए हैI लेकिन यह म़ोब लिंचिंग की घटनाएँ, कभी गाय को लेकर तो कभी बाल काटने के नाम पर, तो कभी बच्चा उठाने के नाम पर जन भावनायें भड़काई जाती हैसाथ में इस तरह की भीड़ को राजनीतिक समर्थन भी भरपूर मिला है, जिससे भीड़ की अराजकता बढती जा रही है पिछले 5 सालो में यह घटनाएँ बढ़ ही रही हैं और लगभग 120 लोग मारे गए हैं

अब समय आ गया है कि  भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने की घटनाओं से निबटने के लिए 2018 में उच्चतम न्यायलय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों को केंद्र व राज्य सरकारों को लागू करना चाहिए I जिसमें विशेष कानून बनाये जाने के लिए आदेशित किया गया है। केंद्र सरकार ने तो अभी तक कोई कानून नहीं बनाया और जिन राज्यों ने, जैसे मणिपुर, राजस्थान, पश्चिम बंगाल की राज्य विधानसभाओं ने कानून भी पारित किये हैं लेकिन उन्हें राष्ट्रपति महोदय ने अभी तक अपनी मंजूरी नहीं दी है I

देश में अमन शान्ति बनाये रखने के लिए  और धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने की चेष्टा करने वालों के विरुद्ध सख्त क़ानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसके लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय को तुरंत लंबित विधेयकों को तत्काल महामहिम राष्ट्रपति से हस्ताक्षर करवाकर इन्हें कानूनी रूप देने में मदद करनी चाहिए और म़ोब लिंचिंग के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर पुख्ता कानून लाया जाये जिससे कि देश में भारी अराजकता रोकी जाए


अरुणा रॉय, शंकर सिंह, निखिल डे एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन के सभी साथी


मजदूर किसान शक्ति संगठन की ओर से

May diwas statement

‘ग्रामीण क्षेत्र में हर व्यक्ति को रोजगार की गारंटी दी जाये’- अरुणा रॉय

‘शहरी रोज़गार गारंटी कानून बनाया जाये’- निखिल डे

भीम, 1 मई 2020

कोरोना महामारी की वजह से अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस व मजदूर किसान शक्ति संगठन का 30वां स्थापना दिवस वर्चुअली (ऑनलाइन) मनाया गया जिसमें राजस्थान सहित पूरे देश के संगठन व यूनियन से जुड़े साथियों ने भाग लिया. आज कोरोना महामारी के समय में देश का सबसे बड़ा तबका, मजदूर, कोरोना से तो लड़ ही रहा है, पर  उसके साथ-साथ भय, भूख और रोज़गार के संकट से भी जूझ रहा है. हम सभी जानते हैं, कि कुल मजदूरों के  93% प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है. वे गरीबी से भयंकर रूप से लड़ रहे हैं. अधिकतर प्रवासी मजदूरों के पास खाने को कुछ नहीं है और जरुरत के अन्य सामान खरीदने के लिए कुछ भी नहीं बचा है. इस संकट के समय में मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है, जितने दिन उन्होंने काम किया, उन्हीं दिनों का भुगतान नहीं किया गया है तो लॉकडाउन के दौरान का भुगतान मिलना तो उनके लिए शायद सपने जैसा ही है.

आज मई दिवस की ऑनलाइन शुरुआत करते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक सदस्य और सामाजिक कार्यकर्त्ता अरुणा रॉय ने कहा कि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर शहरों से लौटकर गाँव की ओर जा रहे हैं. इसलिए, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी रोज़गार कार्यक्रम के अंतर्गत जो भी वयस्क, जितने भी दिनों के लिए काम मांगता है, उसे उतने दिन काम दिया जाये. ये ऐसा समय है जब ग्रामीण क्षेत्र में हर वयस्क को काम की आवश्यकता है.  

आज के इस कार्यक्रम में राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की राज्य अध्यक्षा नौरतीबाई, जो 80 के दशक से असंगठित क्षेत्र के मजदूर हकों के लिए संघर्षरत हैं, ने कहा कि कोरोना महामारी ने मजदूरों के लिए एकता का एक बार फिर मौका दिया है क्योंकि इस समय में सबसे अधिक भेदभाव मजदूरों के साथ ही किया जा रहा है.

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने संकट के इस समय में शहरी रोज़गार गारंटी कानून बनाये जाने की मांग रखी क्योंकि अभी शहरों में लोगों के पास कोई काम नहीं है. पहले भी बहुत लोगों के पास काम नहीं था लेकिन अब तो शहरी क्षेत्र में काम दिए जाने की सख्त आवश्यकता है.

संगठन के पुराने साथियों ने एक मई को आयोजित होने वाले मेले के बारे में अपने अनुभव साझा किये, वैसे भी पिछले 30 वर्षों में यह पहला मौका है जब यह मेला नहीं हुआ है. इस मेले में हजारों की तादाद में लोग आते हैं और ये लोगों के लिए एक आदत बन गई है, कि एक मई को पाटिया के चौड़े, भीम जिला राजसमन्द में मजदूरों का मेला होगा. लोग मेले में आते हैं और मंच से चल रही बातचीत तो सुनते ही हैं, बहुत सस्ते भाव पर मिलने वाला सामान भी खरीदते हैं और आनंदित होते हैं.

इस मजदूर मेले के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और रोज़गार के लिए जो आन्दोलन हुए, उनके इतिहास पर भी बात हुई क्योंकि यह मजदूर मेला सूचना के अधिकार, राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी सहित कई अन्य कानूनों के लिए हुए आन्दोलनों का गवाह रहा है. इस मेले के दौरान स्थानीय लोगों ने जो मुद्दे उठाये, वे राष्ट्रीय पटल तक गए और उ मुद्दों पर आगे जाकर कानून बने.

इस मौके पर प्रसिद्द समाज विज्ञानी सतीश देशपांडे ने कोरोना काल में मजदूरों की समस्याओं पर ध्यान आकर्षित किया. वहीँ मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पीयूसीएल की राज्य अध्यक्षा कविता श्रीवास्तव ने लॉकडाउन की वजह से हो रहे मजदूरों और अन्य लोगों पर मानवधिकार दमन के मामलों पर प्रकाश डाला. उन्होंने यह भी कहा कि लॉकडाउन के दौरान हुए दमनों ने आपातकाल के दौरान हुए दमनों को भी पीछे छोड़ दिया है. हमारे साथ दक्षिण एशिया जानी मानी महिला अधिकार कार्यकर्ता कमला भसीन भी शामिल हुईं और उन्होंने मई दिवस मेले को याद करते हुए, अनेक वर्ग, उम्र, दृष्टिकोण के साथियों का एक संगम सामान कहा.

मीटिंग में लोकतंत्रशाला के सचिव लाल सिंह, रेनी, नवाज, मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्य शंकर सिंह, नारायण सिंह, करुणा मुथैया, मृदु शर्मा, विनीत, लक्ष्मी चौहान, मीराबाई, रूपसिंह, सौम्या किडाम्बी, नचिकेत, पारस बंजारा, दिग्विजय सिंह, सबा, प्राविता कश्यप, श्रेणिक मुथा, जननी श्रीधरन, कालूराम, रुकमनी देवी, अमित शर्मा, अविनाश, ब्रह्मचारी, अनुमेहा, राधिका गणेश, रक्षिता स्वामी, नंदिनी, शुभांगी शुक्ला, लक्ष्मण सिंह, रतन, शीलू, दीपू, एवं अन्य सभी कार्यकर्ता जुड़े तथा पेंशन परिषद् से नैंसी, भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति से कोमल श्रीवास्तव, सूचना का अधिकार मंच से कमल टांक,  सूचना के जन अधिकार के राष्ट्रीय अभियान से भास्कर प्रभु, असमी शर्मा, मजदूर किसान किराना स्टोर से मोहन सिंह, गोपाल सिंह, जन आन्दोलनों के समन्वय से अखिल चौधरी, मानवाधिकार संगठन पी यू सी एल से शुभा, राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन के राज्य सचिव बालुलाल, मुकेश गोस्वामी, निखिल शेनॉय, नोरतमल, कार्तिक सिंह, ईश्वर सिंह, कमलराज, सिमरन, हेमलता, माया, कनिका,व अन्य कई कार्यकर्त्ता जुड़े.


बालूलाल, रूपसिंह, निखिल शेनॉय, विनीत, कार्तिक, ईश्वर, लक्ष्मण, मुकेश, शुभांगी एवं अन्य सभी साथी

मजदूर किसान शक्ति संगठन और राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की ओर से

All iNDIA gENERAL STRIKE | 8 January 2020



STATEMENT ON death of constable abdul ghani in barar panchyat, bhim block